भारत में परिवहन का भविष्य तेजी से बदल रहा है, और इस बदलाव के केंद्र में है ‘इलेक्ट्रिक वाहन’। पिछले कुछ वर्षों में, ईवी की बिक्री में जो उछाल देखा गया है, वह इस बात का संकेत है कि भारतीय ग्राहक अब पर्यावरण के प्रति जागरूक हो रहे हैं। सरकार की ‘फेम’ (FAME) योजना और विभिन्न राज्यों द्वारा दी जा रही सब्सिडी ने इलेक्ट्रिक गाड़ियों को आम आदमी की पहुंच के करीब ला दिया है। अब लोग पेट्रोल-डीज़ल के बढ़ते दामों से छुटकारा पाने के लिए ईवी को एक बेहतर निवेश मान रहे हैं।
2026 तक भारत में चार्जिंग इंफ्रास्ट्रक्चर का नक्शा पूरी तरह बदलने वाला है। रिलायंस, टाटा पावर और अडानी जैसी बड़ी कंपनियां देश के कोने-कोने में फास्ट चार्जिंग स्टेशन लगा रही हैं। अब केवल बड़े शहरों में ही नहीं, बल्कि नेशनल हाईवे और छोटे कस्बों में भी चार्जिंग की सुविधा उपलब्ध हो रही है। इससे ‘रेंज की चिंता’ खत्म हो रही है और लोग अब बेझिझक लंबी यात्राओं के लिए भी इलेक्ट्रिक कारों और बाइक्स का चुनाव कर रहे हैं।
बैटरी तकनीक में हो रहे सुधारों ने ईवी की कीमतों को कम करने में बड़ी भूमिका निभाई है। भारत अब लिथियम आयन बैटरी के घरेलू उत्पादन पर जोर दे रहा है, जिससे भविष्य में इलेक्ट्रिक वाहनों की लागत में 20-30% की कमी आने की उम्मीद है। जब एक इलेक्ट्रिक कार की कीमत पेट्रोल कार के बराबर हो जाएगी, तो भारतीय बाजार में ईवी का वर्चस्व पूरी तरह स्थापित हो जाएगा। कई स्टार्टअप कंपनियां भी अब किफायती और स्वदेशी ईवी मॉडल बाजार में उतार रही हैं।
सार्वजनिक परिवहन के क्षेत्र में भी इलेक्ट्रिक बसों और ई-रिक्शा ने बड़ी क्रांति ला दी है। दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु जैसे महानगरों में अब हजारों इलेक्ट्रिक बसें चल रही हैं, जिससे वायु प्रदूषण के स्तर में काफी सुधार देखा गया है। इसके अलावा, लॉजिस्टिक कंपनियां भी अब सामान की डिलीवरी के लिए इलेक्ट्रिक फ्लीट का इस्तेमाल कर रही हैं। यह न केवल कार्बन उत्सर्जन को कम करता है, बल्कि कंपनियों के परिचालन खर्च (Operational Cost) को भी काफी घटा देता है।
निष्कर्ष यह है कि भारत में ईवी क्रांति केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन गई है। स्वच्छ ऊर्जा की ओर यह कदम हमें एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य की ओर ले जा रहा है। अगर आप भी नई गाड़ी खरीदने की सोच रहे हैं, तो 2026 का साल आपके लिए इलेक्ट्रिक की ओर स्विच करने का सबसे सही समय साबित हो सकता है।
